रात के दो बज गए हैं।
दिल्ली में सब सो चुके हैं। सड़कें सुनसान हैं। राज के उस छोटे से किराए के कमरे में एक पंखा घूम रहा है और एक बल्ब जल रहा है। चारपाई पर लेटे हुए अभी दस मिनट भी नहीं हुए थे कि फ़ोन बज उठा।
“साहब… बस रुक गई। टायर फट गया। जम्मू हाईवे पर खड़े हैं।”
राज ने आँखें मलीं। उठ बैठा। नींद कहाँ थी वैसे भी। दिमाग तो रात को भी चलता रहता है। ड्राइवर को समझाया, मैकेनिक का नंबर दिया, पैसे का इंतज़ाम करवाया। ढाई बज गए जब तक बात खत्म हुई।
वापस लेटा। छत को देखता रहा।
सुबह पाँच बजे उठना है।
यह कोई एक रात की बात नहीं है। यह हर रात की कहानी है।
राज जलंधर का रहने वाला है। घर वहाँ है, माँ वहाँ है, पत्नी वहाँ है, दो बच्चे वहाँ हैं। पर राज खुद दिल्ली में है। अकेला। एक छोटे से कमरे में। एक ऐसी कंपनी का दिल्ली का काम संभालता है जिसका दफ्तर चंडीगढ़ में है।
कंपनी के पास चालीस बसें हैं। कुछ बसें स्टारलाइन ट्रेवल्स को दी हुई हैं, कुछ रॉयलपाथ टूर्स के साथ अनुबंध है, कुछ मेट्रोकनेक्ट कंपनी की कारपोरेट बुकिंग चलाती हैं। कोई बस कटरा जाती है, कोई जम्मू, कोई इंदौर, कोई पुणे। रास्ते अलग हैं, मालिक अलग हैं, पर जब भी कोई अड़चन आती है तो सबका एक ही नंबर खुलता है।
राज का नंबर।
सुबह का पहला फ़ोन पाँच बजे आता है।
कोई ड्राइवर बोलता है बस स्टार्ट नहीं हो रही। कोई कहता है यात्री झगड़ा कर रहे हैं। कोई टोल पर फँसा है, पैसे खत्म हो गए। कोई रात की यात्रा का भत्ता माँग रहा है जो अभी तक खाते में नहीं आया।
और यात्रियों के फ़ोन अलग से आते हैं।
स्टारलाइन का बुकिंग मैनेजर घड़ी देखते ही फ़ोन करता है कि बस आधा घंटा देर से क्यों आई। रॉयलपाथ का आदमी पूछता है कल की यात्रा पक्की है ना, ड्राइवर का नाम बताओ। मेट्रोकनेक्ट का बंदा महीने भर से पूछ रहा है कि बिल अभी तक क्यों नहीं आया।
और बीच में किसी यात्री का सीधा फ़ोन आ जाता है।
“भाई साहब, ड्राइवर ने बस नहीं रोकी, बच्चे को शौचालय जाना था।”
राज एक साथ तीन बातें करता है। चाय रखी है, ठंडी हो जाती है। रोटी है, खाना याद नहीं रहता।
तनख्वाह का दिन सबसे भारी होता है।
चालीस बसें हैं। हर बस पर एक ड्राइवर, एक सहायक। यानी करीब अस्सी लोगों का हिसाब। किसी का ओवरटाइम बाकी है, किसी का उधार नहीं कटा, किसी को पूरा नहीं आया।
“साहब, मेरे खाते में चार हज़ार कम आए।”
“साहब, पत्नी बीमार है, पेशगी मिलेगी?”
“साहब, मुझे नकद चाहिए, खाते में नहीं।”
राज न हिसाबकिताब का आदमी है, न दफ्तर का बाबू। पर यह सब उसी के पास आता है। क्योंकि ड्राइवरों को बस इतना पता है, साहब से बात करो, वो ठीक कर देंगे।
और राज करता भी है। बैठकर एक एक का हिसाब मिलाता है। रात को।
एक बार की बात है।
रात के करीब तीन बजे एक ड्राइवर का फ़ोन आया। आवाज़ में घबराहट थी।
“साहब, यात्री उतर गए। बोल रहे हैं बस में खराब गंध आ रही है। बीच रास्ते में हैं।”
राज ने पूछा कहाँ हो। बताया। राज ने दूसरी बस का इंतज़ाम करवाया। यात्रियों को शांत करवाया। स्टारलाइन के मैनेजर को सुबह चार बजे फ़ोन किया। माफ़ी माँगी। समझाया। उस रात राज सोया नहीं।
अगले दिन दफ्तर में मालिक ने पूछा कि यह मामला कैसे हुआ।
राज ने सब बताया।
मालिक ने कहा, “ध्यान रखा करो।”
बस इतना।
हफ्ते में एक बार, कभी कभी दो हफ्ते में एक बार, राज घर जाता है।
बच्चे दौड़कर आते हैं। छोटा बेटा गले लग जाता है। बड़ी बेटी पूछती है, “पापा, इस बार कितने दिन रहोगे?”
राज जवाब नहीं दे पाता।
पत्नी कुछ नहीं कहती। चुप रहती है। पर उसकी आँखों में एक सवाल हमेशा होता है जो होठों तक नहीं आता। वो जानती है कि यह ज़िंदगी ऐसी ही है। शिकायत करने से कुछ नहीं बदलेगा। पर दिल का दर्द तो दिल में ही रहता है ना।
माँ बोलती है, “बेटा, खाना खाकर जाना। थका हुआ लग रहा है।”
राज खाना खाता है। रात को सो नहीं पाता वहाँ भी, क्योंकि किसी ड्राइवर का फ़ोन आ जाता है।
एक रात राज के फ़ोन पर ग्यारह बजे मैसेज आया।
एक ड्राइवर ने लिखा, “साहब, मेरा बच्चा बीमार है। घर जाना है। कल की ड्यूटी नहीं कर सकता।”
राज ने दूसरे ड्राइवर को फ़ोन किया। वो नहीं उठाया। तीसरे को किया। उसने मना किया। चौथे ने कहा ठीक है पर पाँच सौ ज़्यादा लूँगा।
राज ने हाँ कर दी। खुद की जेब से।
किसी को पता नहीं चला।
पुणे का काम भी कभी कभी देखना पड़ता है। वहाँ से भी फ़ोन आते हैं। वहाँ के हालात भी ठीक नहीं रहते। राज दिल्ली बैठे बैठे पुणे की गाड़ियों का भी हिसाब रखता है। दो जगह की ज़िम्मेदारी, एक आदमी।
किसी ने कभी पूछा नहीं कि यह कैसे होता है।
और फिर एक दिन मालिक का फ़ोन आया।
“राज, लगता है दिल्ली में काम पटरी पर नहीं है। गाड़ियाँ लेट हो रही हैं, शिकायतें आ रही हैं।”
राज चुप रहा।
क्या बोलता। यह बताता कि रात दो बजे हाईवे पर खड़ी बस को उसने फ़ोन पर ठीक करवाया? यह बताता कि तनख्वाह के दिन वो खुद ड्राइवरों का एक एक हिसाब मिलाता है? यह बताता कि पिछले दो हफ्ते में वो घर नहीं गया क्योंकि काम नहीं छोड़ सका?
कुछ नहीं बोला।
बस इतना कहा, “ठीक हो जाएगा साहब।”
फ़ोन रख दिया।
और बाहर निकलकर एक कप चाय पी। ठंडी थी।
यह ज़िंदगी ऐसी है जिसे समझना हो तो उसमें उतरना पड़े।
बाहर से देखने वाले सोचते हैं कि बसें चलती हैं, पैसा आता है, क्या मुश्किल है। पर जो इस काम में है, वो जानता है कि हर बस के पीछे कितनी रातें हैं। कितने फ़ोन हैं। कितनी परेशानियाँ हैं जो कहीं लिखी नहीं जातीं।
ड्राइवर परेशान है तो राज के पास आता है। यात्री नाराज़ है तो राज के पास आता है। मालिक को जवाब चाहिए तो राज से चाहिए। और राज खड़ा है, तीनों के बीच, अकेला।
न उसकी तारीफ होती है जब सब ठीक जाता है। बस गड़बड़ी होने पर नाम आता है।
राज ने एक बार अपने एक दोस्त से कहा था।
“यार, इस काम में न खुद का वक्त है, न घर का। सोने का पता नहीं, खाने का ठिकाना नहीं। जो काम करो वो दिखता नहीं, जो गलती हो वो सबको दिखती है। पर फिर भी करते हैं। क्योंकि अगर हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा।”
दोस्त चुप रहा।
क्या जवाब देता।
चालीस बसें हैं।
हर बस के पीछे एक ड्राइवर है, एक सहायक है, एक परिवार है, एक उम्मीद है।
और उन सबके बीच एक आदमी है जो दिल्ली के एक छोटे कमरे में रात को फ़ोन पकड़े सोता है ताकि कोई ज़रूरी बात छूट न जाए। जिसके घर में बच्चे इंतज़ार करते हैं। जिसकी माँ पूछती है कब आएगा। जिसकी पत्नी चुप रहती है पर समझती है।
उसका नाम है राज।
और उसकी यह ज़िंदगी उन लाखों लोगों की ज़िंदगी है जो इस देश में परिवहन की रीढ़ बने हुए हैं। जो रात को जागते हैं ताकि दूसरे सुबह अपनी मंज़िल पर पहुँच सकें।
जिन्हें कोई नहीं देखता। जिनकी कोई तारीफ नहीं करता।
पर जिनके बिना यह देश एक कदम भी नहीं चल सकता।
लेखक: कुलविंदर सिंह, प्रो पंजाब न्यूज़








