कुलविंदर सिंह | ProPunjabNews.com
वो कुर्ता आज भी अलमारी में रखा है।
सफेद रंग का। थोड़ा पीला पड़ गया है। कॉलर पर एक छोटी सी सिलाई टूटी हुई है जो बाबा ने खुद सुई धागे से जोड़ी थी। मैंने कई बार सोचा इसे धो दूँ, ठीक कर दूँ। पर हाथ नहीं उठता।
क्योंकि उस कुर्ते पर अभी भी बाबा की खुशबू है।
बाबा कोई बड़े आदमी नहीं थे।
सरकारी स्कूल में चपरासी थे। तीस साल तक। रोज़ सुबह पाँच बजे उठते, वो सफेद कुर्ता पहनते, साइकिल उठाते और निकल जाते। बारिश हो, धूप हो, ठंड हो साइकिल कभी नहीं रुकी।
मैंने एक बार पूछा था बाबा, कभी थकते नहीं?”
उन्होंने हँसकर कहा था “बेटा, थकना उनको होता है जिनके पास विकल्प होते हैं। हमें तो बस चलते रहना है।
उस वक्त मैं छोटा था। समझा नहीं। आज हर सुबह जब खुद उठता हूँ वो बात याद आती है।
हम चार भाई-बहन थे।
पैसे कम थे, पर घर में कभी किसी चीज़ की कमी नहीं लगी। यह बाबा का हुनर था। जो था, उसी में इतना प्यार भर देते थे कि कम कभी दिखता ही नहीं था।
ईद पर नए कपड़े नहीं मिले तो बाबा ने पुराने कपड़े इस्त्री करके इस तरह तह लगाई कि वो नए लगने लगे। दिवाली पर पटाखे नहीं थे तो घर के बाहर दीये इतने जलाए कि पूरी गली रोशन हो गई।
ग़रीबी को उन्होंने कभी घर के अंदर नहीं आने दिया।
मेरी पढ़ाई के लिए बाबा ने अपनी घड़ी बेची थी।
मुझे पता नहीं चला। बाद में माँ ने बताया। कहा “तेरे कॉलेज की fees के लिए पैसे नहीं थे। बाबा ने चुपचाप बाज़ार जाकर घड़ी बेच दी। और घर आकर बोले हो गया इंतज़ाम।”
मैंने पूछा “माँ, उन्होंने मुझे बताया क्यों नहीं?”
माँ बोली “क्योंकि बाप अपना दर्द बच्चों को नहीं दिखाता।”
उस दिन मैं बाथरूम में गया और ज़ोर से रोया। बहुत देर तक।
बाबा को एक ही शौक था रात को चाय पीते हुए अखबार पढ़ना।
रोज़ रात वो दरवाज़े के बाहर कुर्सी डालकर बैठते। एक कप चाय। अखबार। और चाँद को देखते रहते।
मैं उनके पास बैठ जाता।
वो कहते “बेटा, ज़िंदगी में एक काम ज़रूर करना।”
“क्या बाबा?”
“जो भी करो ईमानदारी से करो। नींद अच्छी आती है।”
बस इतनी थी उनकी फ़िलॉसफी। कोई बड़ा lecture नहीं, कोई किताब नहीं। बस ईमानदारी से जियो।
जब मैंने पहली नौकरी लगी तो पहली तनख्वाह से एक घड़ी खरीदी।
बाबा के लिए।
वही वाली जैसी उन्होंने बेची थी। काली पट्टी, सफेद डायल।
जब मैंने उनकी कलाई पर बाँधी तो उनकी आँखें भर आईं। बाबा की आँखें जो मैंने ज़िंदगी में पहली बार भरते देखी थीं।
उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मेरा हाथ पकड़ लिया।
और उस एक पल में सब कुछ कह दिया।
बाबा तीन साल पहले चले गए।
अचानक। एक सुबह जब वो उठे नहीं।
माँ ने आवाज़ लगाई। कोई जवाब नहीं आया।
जो आदमी तीस साल से हर सुबह पाँच बजे उठता था वो उस दिन नहीं उठा।
उनके जाने के बाद अलमारी खोली तो वो सफेद कुर्ता मिला।
तह लगा हुआ। करीने से रखा हुआ।
जैसे जानते थे कि जा रहे हैं और सब कुछ ठीक से रख गए।
मैंने वो कुर्ता उठाया। सीने से लगाया। और बहुत देर तक खड़ा रहा।
आज जब मेरा बेटा मुझसे पूछता है “पापा, दादाजी कैसे थे?”
मैं उसे वो कुर्ता दिखाता हूँ।
और कहता हूँ
“बेटा, यह कुर्ता देख। इसमें कोई कढ़ाई नहीं, कोई ब्रांड नहीं। पर इसे पहनने वाले आदमी ने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। यही थे तेरे दादाजी।”
बाबा,
आपकी घड़ी आज भी मेरी कलाई पर है।
और आपका कुर्ता अलमारी में।
दोनों की खुशबू अभी भी वैसी ही है।
📰 ProPunjabNews.com | Writer Kulwinder Singh







