अजमेर से ब्यावर, नसीराबाद से बिजयनगर और जयपुर मार्ग पर एक बड़ा खुलासा हुआ है। इन सड़कों पर सक्रिय तेल माफिया ने पूरा एक संगठित नेटवर्क खड़ा कर लिया है। इस नेटवर्क में ऑयल डिपो से निकलने वाले टैंकर रास्ते में ही हल्के होने लगते हैं। जांच में सामने आया कि साधना क्षेत्र में स्थित ऑयल डिपो से निकलने वाले टैंकर हाईवे छोड़कर खेतों के आसपास बनी बाड़ों में चले जाते हैं। वहां से कच्चे रास्तों, कंकड़पथ और ढाबों के पीछे सुनसान जगहों पर तेल निकाला जाता है।
पड़ताल में यह भी सामने आया कि यहां केवल पंद्रह से बीस मिनट में पचास से डेढ़ सौ लीटर पेट्रोल या डीजल निकाल लिया जाता है। इसके बाद पेट्रोल में उतनी ही मात्रा में एथेनॉल और डीजल में बायोडीजल मिलाकर टैंकर को आगे रवाना कर दिया जाता है। सबसे हैरानी की बात यह है कि टैंकरों में जियो फेंसिंग आधारित इलेक्ट्रॉनिक लॉक लगा होता है, जो केवल पंप मालिक के पास मौजूद ओटीपी से ही खुलता है। इसके बावजूद डिपो से पंप तक के रास्ते में चोरी रुक नहीं रही।
तेल चोरी के तीन प्रमुख तरीके सामने आए हैं। पहला, ऑयल टैंकर में बने पैंच से सक्शन पंप के जरिए तेल निकालना। दूसरा, टैंकर के ऊपर या नीचे का ढक्कन खोलकर सीधे तेल निकालना। तीसरा, डैटम प्लेट में तकनीकी बदलाव करके भारी मात्रा में हेराफेरी करना।
जांच के दौरान कई ढाबों पर संदिग्ध गतिविधियां भी देखी गईं। कुछ जगहों पर ग्राहक बनकर पहुंचने पर ढाबा संचालकों ने पेट्रोल डीजल सस्ते दामों में बेचने की पेशकश की। हालांकि शर्त यह रखी गई कि कम से कम बीस लीटर तेल एक साथ लेना होगा। इससे साफ है कि चोरी का यह तेल खुले बाजार में भी बेचा जा रहा है।
गर्मियों के मौसम में यह चोरी और बढ़ जाती है क्योंकि तापमान बढ़ने पर पेट्रोल डीजल फैलते हैं। इसका फायदा उठाकर तेल माफिया अतिरिक्त वॉल्यूम में से चोरी करते हैं और बाद में एथेनॉल या बायोडीजल मिलाकर टैंकर आगे भेज देते हैं। रिफाइनरी से डिपो तक मापदंड के अनुसार तापमान का पंद्रह डिग्री सेल्सियस पर होना जरूरी होता है। इंजीनियरों के अनुसार अगर ऑटोमैटिक टेंपरेचर कंपनसेशन, इलेक्ट्रॉनिक सील और सख्त जीपीएस मॉनिटरिंग को सही तरीके से लागू किया जाए तो इस चोरी पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है।
पेट्रोल पंप संचालकों का कहना है कि टैंकरों के अंदर और पीछे सीसीटीवी कैमरे तथा इलेक्ट्रॉनिक निगरानी अनिवार्य कर दी जाए तो इस पूरे नेटवर्क पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है। कुछ मामलों में यह भी सामने आया कि जब तेल चोरी को कैमरे में कैद करने की कोशिश की गई तो चोरों ने संबंधित व्यक्ति के साथ मारपीट की और वीडियो फुटेज भी डिलीट करवा दिया। इसकी शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई।
इस पूरे मामले से यह साफ हो गया है कि जीपीएस ट्रैकिंग सिस्टम होने के बावजूद डिपो तक सूचना पहुंचने पर भी समय रहते कार्रवाई नहीं हो पाती। ऐसे में डिपो से पंप तक तेल की सुरक्षा सुनिश्चित करना ऑयल कंपनियों और स्थानीय प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी बन जाती है।








