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रोज सुबह 6 बजे का अलार्म और एक सपना जो कभी जगा ही नहीं हर मिडल क्लास आदमी की कहानी, जो शायद आपकी भी है

रमेश हर सुबह ठीक 6 बजे उठता है। चाय का कप हाथ में लेकर बालकनी में खड़ा होता है, और दो मिनट के लिए आसमान देखता है। बस दो मिनट। उसके बाद फिर वही रोज़ की भागदौड़ शुरू हो जाती है।
बीवी टिफिन पैक करती है, बच्चे स्कूल बस के लिए तैयार होते हैं, और रमेश अपनी पुरानी एक्टिवा निकालकर ऑफिस के लिए निकल जाता है। रास्ते में वही ट्रैफिक, वही चौराहा, वही चाय की दुकान जहां रोज़ रुकता है।
ऑफिस में 9 घंटे की ड्यूटी। बॉस की डांट, टारगेट का प्रेशर, और कभी-कभी खुद से सवाल — “मैं यहां क्यों हूं?” लेकिन जवाब आता नहीं, क्योंकि महीने के आखिर में सैलरी आनी है, घर का किराया देना है, बच्चों की फीस भरनी है।
शाम को घर लौटते वक्त रमेश अक्सर सोचता है। कॉलेज के दिनों में उसने सोचा था कि वो एक दिन अपना बिज़नेस खोलेगा। अपनी पहचान बनाएगा। दुनिया घूमेगा। लेकिन वो सपने अब एक डायरी के पुराने पन्नों में दबे रह गए हैं, जिन्हें शायद सालों से किसी ने पढ़ा भी नहीं।
घर पहुंचकर बच्चे दौड़कर गले लगते हैं। बीवी पूछती है, “आज खाने में क्या बनाऊं?” और रमेश मुस्कुरा देता है। इस मुस्कुराहट में थकान भी है, और एक अजीब सा सुकून भी।
रात को सोने से पहले रमेश फिर वही दो मिनट निकालता है। खिड़की से बाहर देखता है, और मन में सोचता है “कल फिर वही दिन होगा। लेकिन शायद इसी रोज़ की ज़िंदगी में कहीं वो सपना भी जिंदा है, बस उसका रूप बदल गया है।”
क्योंकि अब उसका सबसे बड़ा सपना सिर्फ इतना है  कि उसके बच्चे वो सब कर पाएं, जो वो खुद नहीं कर पाया।
और शायद यही है हर आम आदमी की असली कहानी  सपने टूटते नहीं, बस अगली पीढ़ी को सौंप दिए जाते हैं।

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Kulwinder singh

Pro Punjab News
Author: Pro Punjab News

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