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कंपनी पर लाखों खर्च कर्मचारी के लिए एक रुपया नहीं  प्राइवेट सेक्टर की कड़वी सच्चाई

वरिष्ठ पत्रकार कुलविंदर सिंह

प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने वाले लाखों लोगों की एक कहानी एक जैसी होती है। पांच साल हो जाएं दस साल हो जाएं या पंद्रह साल  बॉस का नज़रिया वही रहता है। काम पूरा निकाला जाता है, ज़िम्मेदारी पूरी डाली जाती है, लेकिन भरोसा? वो आज भी उतना ही कम है जितना पहले दिन था। यह सिर्फ एक शख्स की बात नहीं है, यह उस पूरे तबके की कहानी है जो रोज़ सुबह घर से निकलता है, रात को थका हुआ लौटता है, और अगले दिन फिर वही चक्र दोहराता है।
ट्रांसपोर्ट कंपनियों में यह तस्वीर और साफ नज़र आती है। यहां GM यानी जनरल मैनेजर से लेकर मैनेजर, सुपरवाइज़र और मेंटेनेंस डिपार्टमेंट तक हर कोई अपनी जगह पर सालों से डटा रहता है, लेकिन ऊपर बैठे मालिक की नज़र में वो आज भी “बदला जा सकने वाला” इंसान ही है। GM रोज़ रूट्स की प्लानिंग करता है, ड्राइवरों की ड्यूटी लगाता है, गाड़ियों का हिसाब रखता है, स्टाफ की दिक्कतें सुनता है  फिर भी कोई बड़ा फैसला लेने का अधिकार उसके पास नहीं होता। मेंटेनेंस वाले दिन-रात गाड़ियां ठीक करते हैं, ताकि कंपनी की कमाई रुके नहीं, मगर जब अपनी बारी आती है  सैलरी बढ़ाने की, या किसी इमरजेंसी में मदद की  तो हाथ खाली कर दिए जाते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है  पैसों का मैनेजमेंट कैसे होता है इन घरों में? जिस आदमी की सैलरी सालों से लगभग एक जैसी ही रहती है, उसके लिए बच्चों की फीस, घर का किराया, बिजली-पानी का बिल, राशन, मेडिकल खर्च सब कुछ हर महीने एक जंग जैसा होता है। बच्चों की पढ़ाई बीच में रुक जाती है क्योंकि स्कूल की फीस टाइम पर नहीं भर पाते। घर में कोई बीमार पड़ जाए तो पैसे उधार लेने पड़ते हैं, क्योंकि सालों की नौकरी के बाद भी जमा-पूंजी के नाम पर कुछ खास नहीं होता। त्योहार आते हैं तो खुशी से ज्यादा टेंशन होती है बच्चों की डिमांड पूरी कैसे होगी, घर के नए कपड़े कहां से आएंगे।
और सबसे तकलीफदेह बात यह है कि जिस कंपनी के लिए यह आदमी अपनी पूरी जवानी निकाल देता है, उसी कंपनी का मालिक अपने ऊपर, अपने बिज़नेस को बढ़ाने पर, नई गाड़ियां खरीदने पर, नए ऑफिस बनाने पर एक मिनट नहीं सोचता। लाखों-करोड़ों रुपये एक झटके में लगा दिए जाते हैं। मगर वही मालिक जब किसी पुराने, वफादार कर्मचारी की मुसीबत के वक्त सामने आता है  किसी ऑपरेशन के लिए पैसे चाहिए हों, किसी इमरजेंसी एडवांस की बात हो  तो अचानक “कंपनी की हालत ठीक नहीं है” का बहाना मिल जाता है। यह दोहरा रवैया हर प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारी ने कभी न कभी ज़रूर महसूस किया है।
काम का प्रेशर भी कम नहीं होता। ट्रांसपोर्ट सेक्टर में तो यह और बढ़ जाता है  रूट्स टाइम पर पूरे होने चाहिए, गाड़ियां ब्रेकडाउन नहीं होनी चाहिए, ड्राइवर समय पर पहुंचने चाहिए, और किसी भी गड़बड़ी की पूरी ज़िम्मेदारी मैनेजमेंट टीम की होती है। फोन 24 घंटे ऑन रहता है, छुट्टी के दिन भी काम की कॉल आती रहती है, और परिवार के साथ बैठे हों तो भी दिमाग में कंपनी की टेंशन घूमती रहती है। यह सब करने के बाद भी, साल के अंत में जब अप्रेज़ल या इंक्रीमेंट की बात आती है, तो हाथ में सिर्फ “अगले साल देखेंगे” जैसा जवाब मिलता है।
सालों की मेहनत के बावजूद जब भरोसा नहीं मिलता, तो इंसान के अंदर एक खालीपन भर जाता है। वह सोचता है क्या मेरी मेहनत की कोई कीमत नहीं? क्या सिर्फ काम निकलवाना ही मकसद है, इंसान की ज़िंदगी की कोई अहमियत नहीं? यह सवाल हर उस कर्मचारी के मन में कभी न कभी आता है, जो सालों से एक ही कंपनी में अपना खून-पसीना लगा रहा है।
ज़रूरत इस बात की है कि कंपनियां अपने पुराने और वफादार कर्मचारियों को सिर्फ “काम करने की मशीन” न समझें। अगर कोई पांच, दस या पंद्रह साल से साथ है, तो उसे सिक्योरिटी देना, उसकी मुश्किलों में साथ खड़े होना, और उस पर भरोसा करना  यह कोई एहसान नहीं, बल्कि उसका हक है। आखिर कंपनी अकेले मालिक से नहीं चलती, उसे चलाने वाले हाथ वही लोग होते हैं जो रोज़ सुबह उठकर बिना शिकायत के अपनी ड्यूटी पर पहुंच जाते हैं।

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Author: Pro Punjab News

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